शाम से आँख में नमी सी है...

 



शाम से आँख में नमी सी है.... 


महीना चैत का है और मौसम मेहनत का। इसी महीने में पता चलता है कि पेट इश्क़ से नहीं, गेहूँ सरसों और अरहर से भरता है। पकी हुई फसलों को जल्दी से घर में ले आने की चिंता का शोर कहीं हार्वेस्टर के रूप में सुनाई दे रहा है तो कहीं ट्रैक्टर के रूप में। सच कहें तो कलम चलाने से कहीं ज्यादा मुश्किल है कुदाल चलाना। 

गाँव में बच चुके आखिरी महुवे से महुआ और हमारी आँखों से पानी लगातार गिर रहे हैं। ऐसे में विजया जी ने कल पूछ लिया कि- आजकल कुछ लिखते नहीं हैं आप! 

हमने हाल - ए - दिल कह दिया - शाम से आँख में नमी सी है.. 

उन्होंने हँसते हुए पूछा कि - तब मान लें कि मुहब्बत हो ही गई आपको हमसे?

कैसे कहते हम उनसे कि चैत विरह का महीना है। इस महीने में दिल सीने में नहीं, अलगनी पर टाँगे हुए चादर की सिलवटों में फड़फड़ाता है...। 

         दरअसल आँखों से मुहब्बत का वही रिश्ता है जो चैत का पसीने से होता है। आँखों की नमी से परेशान होकर कल एक डाक्टर को आँखें दिखाईं तो उन्होंने कहा कि - तेरी आँखों में मुझे प्यार नज़र आता है... 

मन हुआ कि डाक्टर साहब पर खुमार बाराबंकवी साहब के उस शे'र से हमला कर दें - 

वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है। 

आँखों की मुखबिरी का मज़ा हमसे पूछिए।। 

हमने अफसोस के साथ कहा - डा साहब! प्यार व्यार कुछ नहीं है कल धूप में खड़े होकर गेहूँ की फसल कटवाई थी वही धूप लग गई होगी आँखों में। 

         अच्छा सच भी है इश्क़ की बेचैनी और तड़प की माप आर्कमिडीज़ के सिद्धांतों या फ्लेमिंग के बाएं हाथ के नियम और अ का वर्ग +ब का वर्ग टाईप गणितीय सूत्रों से नहीं मापी जाती। बस आँखों की नमी ही बता देती है कि- 'इश्क़ ने गालिब निकम्मा कर दिया'। आँखें मुहब्बत का आई कार्ड होती हैं। 

तभी तो ज़र्मनी के बड़े लेखक और कवि राइबर माॅरिया लिखते हैं कि -

काढ़ लो दोनों नयन मेरे। तुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी नहीं छोडूंगा।।


        मतलब जिन आँखों से हम अरहर की पक चुकी फलियों और गेहूँ की प्रौढ़ा बालियों को देख रहे हैं उन आँखों से कवि ने बस एक ही काम लिया- 'उसकी' ओर देखते रहने का। 

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भी कहते हैं कि - तिरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है 

अब कैसे कहें हम कि जनाब उसके बाद भी दुनिया में गेहूँ की मड़ाई, अरहर काटना, बखरी बनाना और सरसों सुखाने जैसे काम हैं। 

       उधर पूरब टोले में किसी बँसवारी में टंगे लाउडस्पीकर से आवाज आ रही है - 

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन ब-रंजिश

ब हाल-ए-हिज्रा बेचारा दिल है..

सुनाई देती है जिसकी धड़कन

हमारा दिल या तुम्हारा दिल है 


सच ही तो है चैत विरह का महीना है, प्रिय की स्मृतियों का महीना है, इसमें ऐसा दर्द भरा गीत ही ठीक लगता है। गुलज़ार साहब को यह गीत लिखने की प्रेरणा अमीर खुसरो से मिली थी।इसका मतलब यह है - 

ज़िहाल- ध्यान देना/गौर फ़रमाना

मिस्कीं- गरीब

मकुन- नहीं

हिज्र- जुदाई

भावार्थ यही निकलता है कि मेरे इस गरीब दिल पर थोड़ा ध्यान दीजिए और इसे रंजिश से न देखें। बेचारे दिल को हाल ही में जुदाई का ज़ख्म मिला है।लेकिन अमीर खुसरो ने जो लिखा था वह इसलिए भी अद्भुत है कि उस गज़ल में एक पंक्ति फ़ारसी की है और अगली ब्रज में - 


ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, (फ़ारसी)

दुराये नैना बनाए बतियां | (ब्रज)

कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान, (फ़ारसी)

न लेहो काहे लगाये छतियां || (ब्रज)

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़

वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह, (फ़ारसी)

सखि पिया को जो मैं न देखूं

तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां || (ब्रज)


      लेकिन मेरी आँखों में नमी इसलिए नहीं आई कि मेरे दिल को हिज़्रे गम मिला है इश्क़ में। बल्कि इसलिए आई कि कल शाम को एक किसान की खड़ी गेहूँ की फसल शार्ट सर्किट की आग में जल कर खाक हो गई। खड़ी फसल के नुकसान का दु:ख जवान बेटे के मरने के दु:ख के बराबर होता है। 

लेकिन सुबह उसी किसान को जले हुए खेत की राख में कुदाल चलाते देखा तो पूछ लिया - काका अब क्या करेंगे इसमें? 

काका ने फीकी हँसी हँसकर कहा था कि - असित बाबू मकई बोएंगे और क्या... धरती बाँझ तो नहीं हो गई न! 

हैरान रह गया मैं उस किसान की जिजीविषा और हिम्मत पर। कुछ कहते नहीं बना। सारे शब्द, सारी व्याख्याएं, सारे उपमान जैसे चुक गए। 

       बस तभी से आँख में नमी सी है। धरती का सीना चीरते हुए उस किसान के कुदाल की आवाज़ सीने में धड़कनों की जगह अब भी सुनाई दे रही है। इसलिए मैंने सीने से दिल निकाल कर अलगनी पर टाँग दिया है लेकिन कुदाल की आवाज़ जैसे अब रूह में पेवश्त हो गई है। और अभी पूरे एक पन्ने भरने के बाद लग रहा है कि कितना आसान है कलम चलाना और कितना मुश्किल है कुदाल चलाना... 


असित कुमार मिश्र 

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