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शाम से आँख में नमी सी है...

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  शाम से आँख में नमी सी है....  महीना चैत का है और मौसम मेहनत का। इसी महीने में पता चलता है कि पेट इश्क़ से नहीं, गेहूँ सरसों और अरहर से भरता है। पकी हुई फसलों को जल्दी से घर में ले आने की चिंता का शोर कहीं हार्वेस्टर के रूप में सुनाई दे रहा है तो कहीं ट्रैक्टर के रूप में। सच कहें तो कलम चलाने से कहीं ज्यादा मुश्किल है कुदाल चलाना।  गाँव में बच चुके आखिरी महुवे से महुआ और हमारी आँखों से पानी लगातार गिर रहे हैं। ऐसे में विजया जी ने कल पूछ लिया कि- आजकल कुछ लिखते नहीं हैं आप!  हमने हाल - ए - दिल कह दिया - शाम से आँख में नमी सी है..  उन्होंने हँसते हुए पूछा कि - तब मान लें कि मुहब्बत हो ही गई आपको हमसे? कैसे कहते हम उनसे कि चैत विरह का महीना है। इस महीने में दिल सीने में नहीं, अलगनी पर टाँगे हुए चादर की सिलवटों में फड़फड़ाता है...।           दरअसल आँखों से मुहब्बत का वही रिश्ता है जो चैत का पसीने से होता है। आँखों की नमी से परेशान होकर कल एक डाक्टर को आँखें दिखाईं तो उन्होंने कहा कि - तेरी आँखों में मुझे प्यार नज़र आता है...  मन ह...